<?xml version="1.0" encoding="utf-8" ?>
<rss version="2.0" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" >
<channel>
<title>&quot;شب شعر شکر خند&quot;</title>
<link>http://shekar-khand.blogfa.com/</link>
<description>ای پسته تو خنده زده بر حدیث قند      مشتاقم از برای خدا یک شکر بخند</description>
<language>fa</language>
<generator>blogfa.com</generator>
<lastBuildDate>Thu, 24 Jul 2008 06:24:04 GMT</lastBuildDate>
<item>
<title>شکرخند بیست و یکم شدیدآ برگزار می شود!</title>
<link>http://shekar-khand.blogfa.com/post-20.aspx</link>
<description>خداوندگار عالمیان و آدمیان را صد هزار و یک مرتبه شکر و سپاس که نمردیم و باز نوبت به برگزاری شکرخندی دیگر و تازه تر رسید. جلسۀ پیش که مصادف با تولد شکرخند بود جای سوزن انداختن نبود؛ وای به حال این جلسه که مصادف با تولد مسوول و مجری شکرخند هم هست!....&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;بیست و یکمین شب شعر طنز شکرخند، عصر شنبه ٥ مرداد ٨٧ساعت ٥ تا ٨ در فرهنگسرای هنر(ارسباران)با حضور چهره های مطرح طنز کرۀ زمین  برگزار می شود. فرهنگسرای هنر، طبق معمول در همان ضلع شمال غربی پل سیدخندان، واقع در خیابان جلفا قرار دارد. &lt;/P&gt;
&lt;P&gt;این جلسه نیز از آیتم های مختلف و متنوعی برخوردار خواهد بود و به امید خدا راس ساعت ٥(نه یک دقیقه اینور، نه یک دقیقه اونور) شروع خواهد شد. در ضمن، در این جلسه، فیلم جلسه قبل نیز به صورت DVD عرضه می شود؛یعنی راستش به فروش می رسد. پول کافی با خود به همراه داشته باشید! &lt;/P&gt;
&lt;P&gt;اگر می خواهید روی صندلی بنشینید، حداکثر یک یا نیم ساعت قبل از شروع برنامه باید در مجلس حضور داشته باشید و گرنه باز همان آش است و همان کاسه به جایی رود که باز آید قدح!......شکرخند فقط گل وجود شما را کم دارد. به امید دیارتان در بیست ویکمین جلسه شب شعر طنز شکرخند. لبخند یادتان نرود!&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Thu, 24 Jul 2008 06:24:04 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=shekar-khand&amp;postid=20</comments>
<dc:creator>shekar-khand</dc:creator>
<guid>http://shekar-khand.blogfa.com/post-20.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>شکرخند از شیر گرفته شد!</title>
<link>http://shekar-khand.blogfa.com/post-19.aspx</link>
<description>&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot; color=#000000 size=3&gt; &lt;BR&gt;از آنجا که این هفته در مجله&quot;جوانان امروز&quot; گزارشی از دومین سالگر تولد شکرخند چاپ کردیم، همان گزارش را با اندکی دخل و تصرف، به عنوان گزارش شکرخند بیستم به خورد شما می دهیم!:&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot; color=#000000&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;طي دو سال گذشته، استقبال مردم از «شكرخند»، چنان رشد صعودي داشته كه در جلسة اين ماه شنبه اول (تير) كه با دومين سالگرد تولد آن نيز مقارن شد، در سالن جايي براي سوزن انداختن هم باقي نمانده بود و بعد از پرشدن صندلي‌ها و پله‌ها و تمام منافذ و سوراخ سمبه‌هاي ديگر (!)، به ناچار، گروهي از حضار به سن رحم نكرده و آنجا را نيز به اشغال خود درآوردند، چون تنها جايي بود كه به نظر مي‌رسيد قسر در رفته است!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;
&lt;P&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot; color=#000000&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt; &lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;بار اصلي اجراي شكرخند برعهدة رضا رفيع است و در كنار او، بسته به اين كه «اميرحسين مدرس» يا «داريوش كاردان» سر صحنة فيلمبرداري باشند يا نه، يا «سيدمحمد سادات اخوي» و «شهرام شكيبا» در غيبت دو نفر اول، توي جلسه حضور داشته باشند يا نه، يكي از آنها نقش مجري دوم را برعهده گرفته است. اين بار، سالن به قدري شلوغ بود كه براي به دست آوردن جايي براي نشستن هم كه شده، چهار نفر از آنها پشت ميز مجري‌گري قرار گرفتند و از آنجا كه هر كدام براي خودشان يك پا استاد طنز و تكه پراني هستند، كلي به رونق جلسه افزوده، و در واقع چهار برابر شد!&lt;BR&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;«حامد عسكري» اولين كسي بود كه شعر خواند و از رباعيات طنزآميزش تابلو شد كه دانشجوست:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;لبخند بزن دو چشم باراني را&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;تجويز كني نگاه درماني را&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;يك شعله بخند تا به آتش بكشي&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;دانشكدة علوم انساني را!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;***&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;تو ماه زلالي و كمان ابرويي&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;من اِندِ مرامم و صداقت‌گويي&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;مشكل حل است، عصر يكسر برويم&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;تا دفتر ازدواج دانشجويي!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;اشعار بانمك او، رضا رفيع را خوشحال مي‌كند كه يك نفر از اهالي جنبش دانشجويي به شعراي شكرخند افزوده شده و اشاره هم مي‌كند: «جنبش دانشجويي كه حتماً نبايد سياسي باشد!»&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot; color=#000000&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot; color=#000000&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt; با پرشدن سالن، از شاعرها و دست‌اندركاران جلسه كه خودماني‌ترند، خواسته شد بروند روي سن بنشينند. تعدادي از آقايان طناز (!) اين دعوت را اجابت كردند. به تبع آنها من (ارمغان زمان فشمی)هم «پا به سن گذاشتم» (به قول آقاي رفيع، همه روزي پا به سن مي‌گذارند و اين كار خجالت ندارد!). البته با آن كه صندلي‌ام را به دوستي بخشيده بودم، روي پله‌ها جايي براي خودم داشتم اما به عنوان پرچمدار خانمها بر خود لازم دانستم كه اين كار را انجام بدهم، هر چند مي‌دانستم بعضي از آقايان، همدوشي خانمها را در كنار خود برنمي‌تابند، چنان كه يكيشان هم گفت: «اينجا مردانه است ها!» با اين حركت من باعث شد تا جمعي از خانمها كه از ايستادن و فشار جمعيت به ستوه آمده بودند نيز به ما بپيوندند و روي آن آقا را به رنگ پيراهنش درآورده و كم كنند!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;بدين سان بود كه براي اولين بار، از روي سن به فيلمهايي كه روي پرده پخش مي‌شد نگاه كرديم و خاك صحنه خورديم!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot; color=#000000&gt;يكي از اين فيلمها، انيميشني خارجي بود كه رضا رفيع از «بهرام عظيمي» (سازنده تيزرهاي تلويزيوني كه «سيا ساكتي» او را حتماً مي‌شناسيد) براي پخش گرفته بود. در اين انيميشن، دو نفر ساز مي‌زدند اما به دليل نقص فني يا شايد هم نوع كار، صدايي از سازها شنيده نمي‌شد. «رضا رفيع»، گفت:&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;«همه جا صداي ساز مي‌آيد، خودش را نشان نمي‌دهند، اينجا ساز را نشان مي‌دهند، صدايش درنمي‌آيد!»&lt;BR&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;فيلم ديگر، كاري از «بزرگمهر حسين‌پور» بود كه كنسرتي از شهرام ناظري را به شكل كارتوني تصوير كرده بود.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;«داريوش كاردان» هر بار مثل يك ناظم، به كساني كه روي سن نشسته بودند دستور مي‌داد: «به سمت پرده... حالا برگرديد سمت سالن!»&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot; color=#000000&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;در قسمتي از برنامه، از «ابوالفضل زرويي نصرآباد» به عنوان «بنيانگذار شب‌هاي شعر طنز در ايران» كه با جلسة «در حلقة رندان» شروع شد، دعوت به عمل آمد تا براي حضار شعر بخواند. تا ايشان برود پشت تريبون، مجري‌ها به قدري از شيوة سهل و ممتنع او در سرودن شعر تعريف كردند كه اولين حرفشان اين بود: «اگر به تعريف‌هايتان ادامه بدهيد من آب مي‌شوم!» از آنجا كه شكرخند، مجلسي طنزآميزناك (!) است، عجيب نبود كه رضا رفيع در جواب، بگويد: «اتفاقاً (سالن گرم است و) آب كم داريم!» و مهندس كاوه كه روي سن نشسته بود، به آقاي رفيع يادآوري كند: «آب كم جو، تشنگي‌آور به دست!»&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;ابوالفضل زرويي، مردم را به شعرهايي از كتاب «اصل مطلب» خود ميهمان كرد كه حسابي به آنها چسبيد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;در اين لحظه خانمي كه كنار من نشسته بود، يواشكي از من پرسيد: «اسم شاعر «محكمه الهي»، «جليل جوادي» بود يا «جواد جليلي؟!»&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;ـ هيچ كدام؛ خليل جوادي!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot; color=#000000&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;مدتي پس از شروع برنامه، «رضا صادقي»، خواننده محبوب نسل جوان و همراهانش در ميان تشويق شديد حضار وارد سالن شده و در رديف اول صندلي‌ها جا گرفتند. مهماناني مثل دكتر بوترابي (رئيس پرشين بلاگ) و خانم پولادزاده (مسؤول روابط عمومي پرشين‌بلاگ) و تعدادي از شعراي طنزپرداز، با خالي كردن اين رديف و نشستن روي زمين، به خواننده محبوب مشكي‌پوش، خوشامد گفتند. من متوجه مرد جوان ديگري شدم كه شباهت عجيبي به رضا صادقي داشت و معلوم بود بدل اوست!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;پخش ترانه «وايسا دنيا»، در حالي كه خواننده اش در سالن حضور داشت، همه را به وجد آورد. رضا صادقي، به وسيله ميكروفن سياري كه به او سپرده شد، چند جمله‌اي هم با مردم حرف زد و گفت كه او نيز از طريق شنيدن شعرهاي طنز اين جلسه با شكرخند آشنا شده و خوشحال است كه حالا اينجاست.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;وقتي او به دليل شرايط جسماني‌اش، همان‌طور كه روي صندلي نشسته بود، براي ما حرف مي‌زد، خوشحال بودم كه رنج نشستن روي زمين سن را انتخاب كرده‌ام و به جايش رضا صادقي را برعكس كساني كه روي صندلي‌هاي سالن نشسته بودند، از روبه‌رو مي‌بينم!&lt;BR&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;هنگام پخش ترانه رضا صادقي و بعد از آن، موقع اجراي ترانه ديگري كه «امير حسين مدرس» آن را خوانده بود و «فربد شكرايي» آن را اجرا مي‌كرد، مردم كف مي‌زدند و شادي مي‌كردند.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;«همايون حسينيان»، شاعر طنزپرداز، را ديدم كه ميان جمعيت روي سن نشسته و مي‌گويد: «شاباش، شاباش!» &lt;BR&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;به طوركلي، نمي‌توان منكر علاقه و پيوند ملت ايران با ترانه و موسيقي شد، چنان كه وقتي داريوش كاردان براي لحظاتي رفت و برگشت، در جواب سؤال رضا رفيع كه پرسيد: «كجا رفته بودي؟» گفت: «رفته بودم سقاخونه دعا كنم!» و پاسخ شنيد: «دروغ نگو، دروغ نگو!» من كه هرگز چنين ترانه‌اي را نشنيده بودم، از توالي جملات و خندة مردم، دانستم كه اينها بايد جملاتي از ترانه‌اي معروف باشد، اگرچه از عباس قادري يا جواد يساري!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot; color=#000000&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;«محسن اشتياقي» يك رباعي درباره دومين سالگرد تولد شكرخند خواند:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;«الحق كه شكر خند مكاني است شلوغ&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;چون شير عسل برخي و برخي چون دوغ&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;از غلظت شير و دوغشان فهميدم&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;در سن دو سالگي رسيده به بلوغ!»&lt;BR&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;يكي از شعرهايي كه خوانده شد، تضميني بود بر مصرع «چه كسي مي‌خواهد من و تو ما نشويم؟» از حميد مصدق. اين شعر «رضا رفيع» را به ياد خاطره‌اي انداخت: «در جريان انقلاب، برادرم ديده بود كه كسي، شعر حميد مصدق را قاطي كرده و به اشتباه فرياد مي‌زند: «من اگر برخيزم، تو اگر برخيزي، چه كسي بنشيند؟»! اخوي ما هم به او مي‌گويد: «تو يكي بنشين!» &lt;BR&gt;دوبيتي‌ها و رباعيات «مهدي استاد احمد» هم طرفداران زيادي دارد. از جمله اين يكي كه يك جورهايي به مناسبت روز زن سروده شده بود:&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;«كفگير، گرين كارت، تريلي، ارزن&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;سيم كارت، روماتيسم، ترافيك فرضاً&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;در مورد هر مساله در دنيا هست&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;بايد نظرش را بدهد مادر زن!»&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot; color=#000000&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;يكي از سنت‌هاي خوب شكرخند اين است كه هر ماه «ميهمان ويژه»اي دارد و از او تقدير به عمل مي‌آورد، همان طور كه اين ماه خانم «مريم سعادت» ميهمان ويژه شكرخند بود و اميرحسين مدرس، زندگينامه ايشان را كه رضا رفيع مي‌نويسد، به سبك برنامه «طلوع ماه» براي ما خواند؛ مثلاً دانستيم كه مريم سعادت متولد 24 شهريور، انگوري‌ترين ماه سال(!) در خيابان گرگان، پل‌چوبي تهران است. يك ماه بعد از انقلاب ازدواج كرده و دو پسر به نام‌هاي آرمين (26 ساله) و ماني (21 ساله) دارد. بعد پاي حرف‌هاي خود اين هنرمند خوب نشستيم و در نهايت رضا رفيع به او گفت كه با وجود ايشان، اينجا «سعادت آباد» شده است!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot; color=#000000&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;«شكرخند» جاي خوبي است. نه فقط به خاطر آن كه با دوستانتان دور هم جمع مي‌شويد و ديدارها تازه مي‌شود، نه فقط به خاطر آن كه هنرمندان محبوبتان را از نزديك مي‌بينيد و نه فقط به خاطر آن كه تفريح سالمي به شمار مي‌رود، بلكه به خاطر اين كه به نظر مي‌رسد اين روزها مردم به هرچه كه رنگ و بوي طنز و خنده داشته باشد، علاقه خاصي نشان مي‌دهند!&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;o:p&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot; color=#000000 size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal dir=rtl style=&quot;MARGIN: 0in 0in 0pt&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN dir=ltr&gt;&lt;o:p&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot; color=#000000 size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Mon, 30 Jun 2008 06:29:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=shekar-khand&amp;postid=19</comments>
<dc:creator>shekar-khand</dc:creator>
<guid>http://shekar-khand.blogfa.com/post-19.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>گزارشی از دوستان!</title>
<link>http://shekar-khand.blogfa.com/post-18.aspx</link>
<description>&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;عجالتا این گزارش تصویری جالب از &quot;&lt;/FONT&gt;&lt;A href=&quot;http://aksneveshteh.persianblog.ir/&quot; target=_blank&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;میلاد بهشتی&lt;/FONT&gt;&lt;/A&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&quot; را در مورد شکرخند بیستم(دومین سالگرد) داشته باشید تا گزارش خودمان آماده شود!:&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;http://aksneveshteh.persianblog.ir/post/27&lt;/FONT&gt;</description>
<pubDate>Tue, 24 Jun 2008 06:34:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=shekar-khand&amp;postid=18</comments>
<dc:creator>shekar-khand</dc:creator>
<guid>http://shekar-khand.blogfa.com/post-18.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>برگزاری دوسالگی شکرخند، سر تیر!</title>
<link>http://shekar-khand.blogfa.com/post-17.aspx</link>
<description>&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=4&gt;              دعوت به صرف بیستمین شکرخند &lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 18pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-ALIGN: right&quot; align=right&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;IMG title=مژه alt=مژه src=&quot;http://www.persianblog.ir/editor/images/smilies/5.gif&quot; border=0 mce_src=&quot;http://www.persianblog.ir/editor/images/smilies/5.gif&quot;&gt;به حول و قوۀ الهی، و به کوری چشم حسود و بخیل و استکبار جهانی، شب شعر جهانی «شکرخند» دو ساله شد.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-ALIGN: right&quot; align=right&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;به همین مناسبت مجلس ختمی(ختم دوسالگی شکرخند) روز شنبه اول تیرماه، راس ساعت 5 بعد از ظهر در فرهنگسرای هنر(ارسباران) منعقد می باشد. شرکت کلیه تبسم زدگان باعث شادی فضای مجلس و تسلای خاطر بانیان ،شاکیان و سایر وابستگان آن خواهد بود.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-ALIGN: right&quot; align=right&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;SPAN style=&quot;mso-spacerun: yes&quot;&gt; &lt;/SPAN&gt;وسیلۀ ایاب و ذهاب از درب(!) منازل شما به صورت تاکسی، مینی بوس «ون» و اتوبوس و آژانس غیر هسته ای، آمادۀ حمل و نقل شما به این مجلس می باشد.فقط به راننده بگویید تند براند که اگر قبل از ساعت پنج در محل حاضر نباشید، باید روی پای خود بایستید یا سوار پله ها شوید.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-ALIGN: right&quot; align=right&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-ALIGN: right&quot; align=right&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;بیستمین جلسۀ شکرخند را در کنار شما دوستان عزیزشکرخندی جشن می گیریم و برای سلامتی و طول عمر شریف آن دعا می کنیم. دعای جماعت ردخور ندارد. مگر چطور بشود.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-ALIGN: right&quot; align=right&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-ALIGN: right&quot; align=right&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;IMG title=لبخند alt=لبخند src=&quot;http://www.persianblog.ir/editor/images/smilies/1.gif&quot; border=0 mce_src=&quot;http://www.persianblog.ir/editor/images/smilies/1.gif&quot;&gt;وعدۀ دیدار: شنبه 1/4/87 ساعت 5 تا 8 بعد از ظهر، ضلع شمال غربی پل سید خندان، خیابان جلفا، فرهنگسرای هنر(ارسباران)،ردیف.......&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-ALIGN: right&quot; align=right&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-ALIGN: right&quot; align=right mce_style=&quot;margin: 0cm 0cm 0pt; text-align: right;&quot;&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 14pt; mso-bidi-language: FA&quot; mce_style=&quot;font-size: 14pt; mso-bidi-language: FA;&quot;&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;توضیح: ردیف را اگر پیدا نکردید دنبال قافیه نگردید. دیر رسیدید  قافیه را باختید!&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;</description>
<pubDate>Thu, 19 Jun 2008 07:03:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=shekar-khand&amp;postid=17</comments>
<dc:creator>shekar-khand</dc:creator>
<guid>http://shekar-khand.blogfa.com/post-17.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>شکرخندمان منور!(شکرخند19)</title>
<link>http://shekar-khand.blogfa.com/post-16.aspx</link>
<description>&lt;FONT face=Verdana size=4&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT color=#000033&gt;نوزدهمین شکرخند &lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=Verdana color=#000033 size=4&gt;با استقبال فوق العاده مردم روبه رو شد، به طوری که به قول رضا رفیع:&quot; ان شاء ا... روز به روز به رونقش افزوده، تا روزی که تعطیل شود!&quot;( حذف به قرینه لفظی مان، منفجر!)&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;وقتی&quot;رضا رشیدی&quot; نقیضه شعر&quot;کوچه&quot;فریدون مشیری را خواند و رضا رفیع، خاطره ای ازآن مرحوم نقل کرد که مامور سرشماری به در منزلشان رفته و با شنیدن اسم و فامیل، ایشان را شناخته بود، و لطیفه ای را هم که می گوید طرف به مامور سرشماری که پرسیده بود شما چند نفرید، می گوید:من یک نفرم، شما چند نفرید؟&quot;، تعریف کرد، یک نفر چنان هیجان زده خندید که رضا رفیع مجبور شد بگوید:&quot;هیجانتان را کنترل کنید... در خانه شما هم می آیند!&quot;( تو درتویی جملاتمان منحصر!)&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;رضا رفیع، ضمن دعوت از &quot;راشد انصاری&quot;برای شعرخوانی،گفت:&quot;کسانی مثل راشد می کوبند از بندر(عباس) می آیند... یا از بندر می آیند و می کوبند!&quot;&lt;BR&gt;او به &quot;بانی&quot; که طبق معمول، بعد از رفتن روی سن تازه توی جیبش دنبال شعر می گشت گفت:&quot; شما چرا هیچ وقت قبلش در نمی آورید؟&quot; و وقتی حضار خندیدند، توضیح داد:&quot; آخر من همه جا دیده ام که استاد وقتی می آیند بالا، در می آورند...&quot;!(سانسورهایمان منفعل!)&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&quot;مهدی فرج الهی&quot;تعدادی کاریکلماتور از خودش و مرحوم&quot;پرویز شاپور&quot;، در مورد مرگ خواند که اینها مال خودش هستند:&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=Verdana color=#993300 size=4&gt;غزل خداحافظی همه آدمها را شاعر می کند.&lt;BR&gt;عاقبت در بالماسکه زندگی، رخ در نقاب خاک می کشیم.&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=Verdana color=#000033 size=4&gt; &lt;BR&gt;راشد در شعرش که به قول امیرحسین مدرس&quot;خوش قافیه&quot;هم بود، چنین مصرعی داشت:&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=Verdana color=#000033 size=4&gt;یک عده کنند مایه خالی!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=Verdana color=#000033 size=4&gt;جالب آن که استاد کاوه هم چنین شعری خواند:&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT size=4&gt;&lt;FONT face=Verdana color=#000033&gt;باز می بینم که سر، خم کرده ای&lt;BR&gt; بازهم از شرم، سرخم کرده ای...&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=Verdana color=#000033 size=4&gt;و درآن چنین مصرعی داشت:&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=Verdana color=#000033 size=4&gt;مایه خالی بود، درهم کرده ای!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=Verdana color=#000033 size=4&gt;دراین حال، تلفن رضا رفیع زنگ خورد و او گفت:&quot; بله، از اماکن هم پشت خط هستند!&quot; و ادامه داد:&quot;یعنی از مکان جام جم!&quot; &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;در قسمتی از برنامه، ترانه&quot;خلیج فارس&quot;از&quot; ارمغان زمان فشمی&quot; که&quot;میلاد ترابی&quot;( آهنگساز آلبوم کما از حمید عسکری) برایش آهنگی دامبولی(!) ساخته و فرزاد حسنی و امیر زنده دلان آن را خوانده بودند برای حضار پخش شد. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=Verdana color=#000033 size=4&gt;&quot;جمشید مقدم&quot; شعرش را این طور شروع کرد:&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=Verdana color=#993300 size=4&gt;کوچیکش کن عزیزم اون عذابو!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=Verdana color=#000033 size=4&gt;و رضا رفیع رسید:&quot; آن ضمیر، اشاره به چی داشت بی مقدمه؟!&quot;&lt;BR&gt;برخلاف تصور او(!)،ادامه شعر این بود:&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=Verdana color=#000033 size=4&gt;&lt;FONT color=#993300&gt;جدا کن از وجودت اضطرابو&lt;BR&gt;چرا این قدر دس دس می کنی تو؟&lt;BR&gt;عمل کن اون دماغ بی صاحابو!&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT size=4&gt;&lt;FONT face=Verdana color=#000033&gt;به سنت تازه پای جلسه، تعدادی عکس طنزآمیز نمایش داده شد که درپاره ای موارد، توضیحات رضا رفیع از خود عکس طنزآمیزتر بود، مثلا او در شرح عکسی از یک کامیون که راننده، آفتابه اش را در قسمتی از آن نصب کرده بود، گفت:&quot;یاد نامه ای افتادم که زمانی برادرم از هلند برایمان فرستاده و در مورد آن کشور نوشته بود:&lt;BR&gt;در برون، آفتاب پیدا نیست&lt;BR&gt; در درون آفتابه برجا نیست!&quot;&lt;BR&gt; در یکی دیگر از تصاویر، ما پارچه نوشته جالبی را بر سردر یکی از دانشکده های دامپزشکی کشور دیدیم که روی آن نوشته شده بود:&quot; عرصه دامپزشکی، عرصه خدمت به انسان هاست!&quot;&lt;BR&gt;در پارچه نوشته دیگری، خواندیم:&quot; بازگشت پیروزمندانه آقای... از ماه عسل را گرامی می داریم!&quot;&lt;BR&gt;درتصویر دیگر، مردی دیده می شد که کنار خیابان روسری می فروخت و یکی از روسری ها را هم خودش به سر کرده بود تا تبلیغ کرده باشد!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&quot;شهرام شکیبا&quot; پیش از شعرخوانی گفت:&quot; اول چند کلمه می گویم... مستراح!&quot;&lt;BR&gt;دوست بغل دستی من بلند گفت:&quot; دست بزنیم؟!&quot; و جواب شنید:&quot; هرکاری دوست دارید بکنید!&quot;&lt;BR&gt;کلمات بعدی هم چیزهایی در همین مایه بودند و شاعر توضیح داد:&quot; چون شعر من ازاین چیزها نداشت، گفتم قبلش بگویم!&quot; و در ضمن خدا را شکر کرد که در آخرین تصویرپخش شده، آن مرد به فروش روسری اکتفا کرده بود!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;در بخشی ازجلسه، فیلم سرگرم کننده ای از یک کاندیدای ریاست جمهوری دیدیم که شعار انتخاباتی اش این بود:&quot; رییس جمهور، صراف است، مابقی علاف!&quot;&lt;BR&gt;باآن که درآن فیلم به نظر می رسید آقای صراف، رییس جمهور خوبی ازکار در نمی آید، اما با توجه به قافیه شعار انتخابی انتخاباتی فوق، می شود از ایشان برای شعرخوانی در شب شعر شکرخند دعوت به عمل آورد!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&quot;سعید نوری&quot; شعر طبق معمول زیبایی را به مناسبت ۱۴ خرداد که روز تولد اوست، به خودش تقدیم کرد.&lt;BR&gt;به گفته رضا رفیع، &quot;داریوش کاردان&quot; سرصحنه فیلمبرداری بود و نتوانست بیاید. رفیع اشاره کرد:&quot;ما نمی دانستیم آقای کاردان هم در فیلمهای &quot;صحنه&quot; دار بازی می کند!&quot;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;او در ادامه گفت:&quot; خط فقر در تهران ۷۸۰ هزارتومان محاسبه شده. با این حساب، خیلی از کارمندها مفقود الاثرند! ماهم حساب کردیم دیدم محویم، حالا یا محو همدیگر هستیم یا کلا محو شده ایم!&quot; &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;میهمان ویژه این ماه که مثل دو برادر بزرگتر و کوچکتر از خودش، در روز اول بهمن ماه(مصادف با دوم سپتامبرالحرام!) یکی از سالها به دنیا آمده ، صمیمیت و صداقت مجذوب کننده ای داشت.او در خیابان ایران تهران( ما تا حالا فکر می کردیم تهران جزو ایران است، نگو برعکس بوده!) متولد شده و تصادف این ولادت در سال ۴۵، با ولادات برادران در سال های ۴۳ و ۵۰، خبر از اهل حساب و کتاب بودن پدرش و در نظر داشتن چشم انداز اقتصادی خانواده برای برگزاری جشن تولد هرسه فرزنددر یک روز می دهد!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;  &lt;IMG style=&quot;WIDTH: 211px; HEIGHT: 219px&quot; height=3097 alt=&quot;کاریکاتوریست امروز,بازیگر فردا!&quot; hspace=0 src=&quot;http://irapic.com/uploads/1213903069.jpg&quot; width=1988 align=baseline border=0&gt;&lt;BR&gt; &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&quot;&lt;FONT color=#993300&gt;بهرام عظیمی&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT face=Verdana color=#000033 size=4&gt;&quot;، کاریکاتوریست و انیماتور معروف که برخلاف چهره نسبتا جدی اش، خیلی دوست داشتنی و بانمک می باشد، سازنده شخصیت های تلویزیونی تبلیغاتی از جمله &quot;سیا ساکتی&quot; و &quot;خطرناکه حسن&quot;! است.البته خود او درابتدای سخنانش گفت:&quot;من تا امروز فکر می کردم بانمکم اما در این جمع دیگر این طور فکر نمی کنم!&quot;&lt;BR&gt;هنگام پخش چند کاریکاتور از او، وسط توضیح یکی ازآنها که مار کوچکی را نشان می داد که با هدیه ای به دیدار مار بسیار بزرگی که عاشقش شده رفته بود(&quot; که&quot; هایمان منسجم!،اعتراف صادقانه او به دل همه نشست که(منسجم تر!):&quot; من در زندگی همیشه این مار کوچیکه بودم! به خدا این قدر پول خرج هدیه کردم... اما نامردها...!!&quot; &lt;BR&gt;او که تیپ و قیافه ای خاص دارد، گفت از سوی یک کارگردان بنام، برای ایفای نقش میرزا کوچک خان جنگلی دعوت شده و اشاره کرد:&quot;البته این بار قرار است به قسمت هایی از زندگی میرزا کوچک خان پرداخته شود که تا حالا به آنها پرداخته نشده، از جمله قسمت هایی که او با زنش تنهاست ومن خدا را شکر کردم که قرار است باما به آن بپردازند و کنجکاوم که نقش مقابلم چه کسی است!&quot; رضارفیع گفت:&quot; ان شاءا.. که جنیفر لوپز باشد... بیمه هم هست!!&quot;&lt;BR&gt;وقتی بهرام عظیمی از سن پایین آمد و با استادش، آقای کاوه روبوسی کرد، ازآنجا که هر دویشان موهای بلندی دارند، به آنها گفته شد:&quot;موهایتان قاطی نشود!&quot;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&quot;رضا ساکی&quot; به نوبه خود، به تعدادی از تبلیغات به ظاهر جدی اشاره کرد که آخر طنزند:&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT color=#000033&gt;&lt;FONT size=4&gt;&lt;FONT face=Verdana&gt;&lt;FONT color=#993300&gt;فیلمبرداری از تمام مراحل ازدواج!&lt;BR&gt;عروس، سرویس می کنیم!&lt;BR&gt;رفع کم مویی شما با کاشت مو از هرجای بدن!&lt;BR&gt;وسط میرداماد، ۹۰ متر!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;گزارش های شکرخندمان مداوم!&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;
&lt;P&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Sun, 01 Jun 2008 04:19:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=shekar-khand&amp;postid=16</comments>
<dc:creator>shekar-khand</dc:creator>
<guid>http://shekar-khand.blogfa.com/post-16.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>شکرخند نوزدهم برگزار می شود</title>
<link>http://shekar-khand.blogfa.com/post-15.aspx</link>
<description>&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;IMG title=لبخند alt=لبخند src=&quot;http://www.persianblog.ir/editor/images/smilies/1.gif&quot; border=0 mce_src=&quot;http://www.persianblog.ir/editor/images/smilies/1.gif&quot;&gt;سلام بر دوستان و دشمنان شکرخند!......بار دیگر شنبۀ اول ماه از راه آمد و باز نوبت به شکرخندی دیگر رسید. پس بی هیچ مقدمه و موخره ای اعلام می شود که نوردهمین جلسۀ شب شعر طنز شکرخند، روز شنبه 4 خرداد از ساعت 5 تا 8 بعد از ظهر در فرهنگسرای هنر(ارسباران) تشکیل می شود.&lt;?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;mso-bidi-language: FA&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;IMG height=18 src=&quot;http://blogfa.com/images/smileys/24.gif&quot; width=18&gt;حضور سبز و پر طنز شما باعث شادی روح جمیع طنزپردازان گذشته و حال و آینده خواهد شد. چشم انتظار دیدار روی گل شما هستیم.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;mso-bidi-language: FA&quot;&gt;مکان: &lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;SPAN lang=FA dir=rtl style=&quot;mso-bidi-language: FA&quot;&gt;ضلع شمال غربی پل سیدخندان، خیابان جلفا، فرهنگسرای هنر(ارسباران)&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Tue, 20 May 2008 16:25:04 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=shekar-khand&amp;postid=15</comments>
<dc:creator>shekar-khand</dc:creator>
<guid>http://shekar-khand.blogfa.com/post-15.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>تصمیم عوض شد.....شکرخند برگزار می شود!</title>
<link>http://shekar-khand.blogfa.com/post-14.aspx</link>
<description>&lt;FONT size=2&gt;
&lt;P align=right&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P align=right&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P align=right&gt;با سلام مجدد و مشدد!.....بله درست شنیدید و خواندید. تصمیم عوض شد. پنجشنبه ای در اصفهان بودم به عنوان مهمان و مجری اولین جشنواره شعر طنز استان اصفهان، که تلفن زنگ زد!.....&lt;/P&gt;
&lt;P align=right&gt;فلذا در کمال خرازی مسرت به اطلاع شکرخندیان همیشه در صحنه می رسانم که هجدهمین شب شعر طنز شکرخند، شنبه 7 اردیبهشت، راس ساعت 5 در فرهنگسرای هنر(ارسباران) با حضور جمع کثیری از طنزپردازان برگزار می شود.&lt;/P&gt;
&lt;P align=right&gt;حضور شما باعث شادی روح تمام برگزارکنندگان این مجلس و محفل خواهد شد. تا کور شود هر آن که نتواند دید!&lt;/P&gt;
&lt;P align=right&gt;                 ای پسته ی تو خنده زده بر حیث قند&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;                                                 بازم بیا برای دل هر دومان بخند!&lt;/P&gt;&lt;/FONT&gt;</description>
<pubDate>Fri, 25 Apr 2008 11:29:35 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=shekar-khand&amp;postid=14</comments>
<dc:creator>shekar-khand</dc:creator>
<guid>http://shekar-khand.blogfa.com/post-14.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>شکرخند برگزار نمی شود!</title>
<link>http://shekar-khand.blogfa.com/post-13.aspx</link>
<description>&lt;TABLE style=&quot;WIDTH: 100%&quot; cellSpacing=0 cellPadding=0&gt;
&lt;TBODY&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD class=datecell style=&quot;DIRECTION: rtl; TEXT-ALIGN: left&quot;&gt; &lt;/TD&gt;
&lt;TD class=post-right&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;&lt;/TBODY&gt;&lt;/TABLE&gt;
&lt;TABLE style=&quot;TABLE-LAYOUT: fixed; WIDTH: 505px&quot; cellSpacing=0 cellPadding=0&gt;
&lt;TBODY&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD class=post-left&gt;
&lt;P align=justify&gt; &lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;
&lt;TD style=&quot;DIRECTION: rtl; LINE-HEIGHT: 1.5em; TEXT-ALIGN: right&quot;&gt;
&lt;P style=&quot;TABLE-LAYOUT: fixed; MARGIN: 5px 10px; OVERFLOW: hidden&quot; align=justify&gt; &lt;/P&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;&lt;/TBODY&gt;&lt;/TABLE&gt;
&lt;P dir=rtl style=&quot;MARGIN: 3.75pt 7.5pt; DIRECTION: rtl; LINE-HEIGHT: 18pt; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: right&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;سلام بر جمیع دوستان خوب شکرخندی(جمیعاْ و رحمه الله وبرکاته). همچنان که در گفت و گو با دوستان رادیو گفتم؛ عجالتاْ تا اطلاع ثانوی شب شعر طنز&lt;SPAN style=&quot;COLOR: white&quot;&gt; &lt;/SPAN&gt;برگزار نمی شود. ظاهراْ عزیزان سازمان فرهنگی هنری شهرداری(در بخش معاونت هنری جدید آن) سخت مشغول بررسی این مساله هستند که آیا اساساْ تبسم آمیخته با تفکر چیز خوبی است برای مردم یا نه ضرر دارد و عدمش به ز وجود؟!....... فلذا وقت می گیرد تا به طور سرجمع به یک نتیجه محکم و متقن برسند. چنان که مو لای درز آن نرود.&lt;BR&gt;لهذا فعلاْ که در روز شنبه اول ماه(&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: Tahoma; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۷&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;اردیبهشت)برنامه ای نداریم. تا بعد خدا چه خواهد. عزیزان نروند فرهنگسرای شکرخند که با در بسته پیشنهادی مواجه خواهید شد!.....به هر حال بنده خدا گر زحکمت ببندد دری/ به زحمت گشاید در دیگری!.....( جهت کسب اطلاعات دقیقتر و  بیشتر می توانید با شماره تلفن: &lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: Tahoma; mso-bidi-language: FA&quot;&gt;۸۸۴۴۹۱۰۶&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;تماس حاصل نمایید.).&lt;?xml:namespace prefix = o ns = &quot;urn:schemas-microsoft-com:office:office&quot; /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl style=&quot;MARGIN: 3.75pt 7.5pt; OVERFLOW: hidden; DIRECTION: rtl; LINE-HEIGHT: 18pt; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: right&quot;&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;                 ای پسته ی تو خنده زده بر حدیث قند&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA dir=rtl style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: Tahoma; mso-bidi-language: AR-SA; mso-fareast-font-family: &apos;Times New Roman&apos;; mso-ansi-language: EN-US; mso-fareast-language: EN-US&quot;&gt;                                بنشین به ریش ما و خودت روی هم بخند!&lt;/SPAN&gt;</description>
<pubDate>Wed, 23 Apr 2008 16:10:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=shekar-khand&amp;postid=13</comments>
<dc:creator>shekar-khand</dc:creator>
<guid>http://shekar-khand.blogfa.com/post-13.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>لطفاً اسفند دود کنید!</title>
<link>http://shekar-khand.blogfa.com/post-12.aspx</link>
<description>        &lt;FONT color=#808080 size=4&gt;&lt;STRONG&gt;شکرخند ویژه نوروز برگزار می شود&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; align=justify&gt;&lt;SPAN&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;IMG src=&quot;http://www.mypersianblog.com/editor/images/smilies/01.gif&quot; border=0&gt;با سلام و عرض شناور ارادت به تمام بینندگان جان(!)و شکرخندیان عزیزتر از جان و بدتر از آن!.......پس از قریب دو ماه از برگزاری شکر خند پیشین، و با تمام شدن ماه محرم و صفر، هفدهمین جلسه &lt;FONT color=#ff00ff&gt;شب شعر شکرخند&lt;/FONT&gt;  «&lt;FONT color=#ff0000&gt;ویژۀ نوروز&lt;/FONT&gt;» برگزار می شود.&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;&lt;SPAN&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; align=justify&gt;&lt;SPAN&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;STRONG&gt;این &lt;A href=&quot;http://www.shekar-khand.blogfa.com/&quot;&gt;&lt;FONT color=#737373&gt;شکرخند&lt;/FONT&gt;&lt;/A&gt; اسفندی بر خلاف معمول این جلسات که شنبۀ اول هر ماه برگزار می شد؛ این ماه استثنائاً روز دوشنبه 20/12/86 تشکیل می شود. مکان همان فرهنگسرای هنر(ارسباران) است و زمان هم ساعت 4 تا 7 بعد از ظهر(و بلکه بیشتر!)…….&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;&lt;SPAN&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=MsoNormal style=&quot;MARGIN: 0cm 0cm 0pt&quot; align=justify&gt;&lt;SPAN&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;STRONG&gt;این آخرین شکرخند &lt;FONT color=#ff00ff&gt;خانه طنز بنیاد نویسندگان و هنرمندان&lt;/FONT&gt; در سال جاری(1386) خواهد بود. شاید هم آخرین جلسه اش برای همیشه!!.......فلذا از حال و هوای پر جنب و جوش قبل از عید برخوردار بوده و یحتمل بوی نوروز و بهار مشکبوی خواهد داشت. اگر بویی دیگر به مشامتان خورد، از ناحیۀ ما نیست. ممکن است منشا انسانی داشته باشد و مثلاً کسی در جلسه، شعر بودار خوانده باشد!......&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;&lt;SPAN&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;SPAN&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT face=&quot;Times New Roman&quot;&gt;&lt;STRONG&gt;اگر مشغول خانه تکانی هم هستید، ول کنید بیایید شکرخند که چنانچه دیر برسید، باید بیرون فرهنگسرا بنشینید که احتمالاً با تذکر لسانی ماموران مبارزه با سد معبر شهرداری مواجه خواهید شد. از ما گفتن!.......&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;IMG src=&quot;http://www.mypersianblog.com/editor/images/smilies/53.gif&quot; border=0&gt;وعدۀ ما و شما &lt;FONT color=#808000&gt;هفدهمین جلسۀ شب شعر شکرخند&lt;/FONT&gt; ،  فرهنگسرای هنر….             ما&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;STRONG&gt; به کمک شما می خواهیم قبل از چهارشنبه سوری بترکانیم!.....(فعل را محاوره ای نگفتیم، چون ظاهراً صورت خوشی ندارد!).......&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-SIZE: 12pt; FONT-FAMILY: &apos;Times New Roman&apos;&quot;&gt;&lt;STRONG&gt;تلفن ثابت قدم تماس:۲۲۸۰۲۰۴۳ــ۲۲۸۰۲۰۵۸&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Thu, 06 Mar 2008 10:06:00 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=shekar-khand&amp;postid=12</comments>
<dc:creator>shekar-khand</dc:creator>
<guid>http://shekar-khand.blogfa.com/post-12.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>شکرخند هفدهم برگزار نمی شود!</title>
<link>http://shekar-khand.blogfa.com/post-11.aspx</link>
<description>&lt;P align=justify&gt;سلام بر تمام دوستان شکرخند. به دلیل مصادف شدن با ماه محرم و علیرغم نزدیک شدن به ایام الله مبارک دهه فجر و درخواست تشکیل دهندگان این جلسه مبنی بر برگزاری شکرخند؛ هفدهمین جلسه این شب شعر طنز مردمی و شلوغ فردا شنبه ۶ بهمن برگزار نمی شود. خبرهای تکمیلی متعاقبا به اطلاع تمامی طنزدوستان و سایر مردم جهان خواهد رسید. عجالتا بدرود........شما چه نظری دارید؟&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Fri, 25 Jan 2008 12:37:06 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=shekar-khand&amp;postid=11</comments>
<dc:creator>shekar-khand</dc:creator>
<guid>http://shekar-khand.blogfa.com/post-11.aspx</guid>
</item>
</channel>
</rss>
